Monday, January 30, 2023
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World Hepatitis Day 2022: हेपेटाइटिस रोग से किडनी को हो सकते हैं ये 3 नुकसान, जानें बचाव के उपाय

World Hepatitis Day 2022: हेपेटाइटिस रोग में लीवर में सूजन और क्षति पहुंचने लगती है जिसका असर किडनी पर भी पड़ता है। हेपेटाइटिस के चलते किडनी को पहुंचने वाले नुकसान कई प्रकार के हो सकते हैं। आइए इस खास

World Hepatitis Day 2022 Symptoms Types Precautions And Treatment - World  Hepatitis Day 2022: हेपेटाइटिस क्या है? जानें इसके प्रकार, लक्षण और कारण -  Amar Ujala Hindi News Live
Hepatitis Day

World Hepatitis Day 2022: विश्‍व हेपेटाइटिस दिवस का आयोजन हेपेटाइटिस के बारे में जागरूकता का प्रसार करने के उद्देश्‍य से हर साल 28 जुलाई को किया जाता है। लिवर और किडनी ऐसे अंग हैं जिनका आपस में गहरा संबंध है क्‍योंकि लिवर में पैदा होने वाले विषाक्‍त तत्‍वों (टॉक्सिन्‍स) को शरीर से बाहर निकालने का काम गुर्दे (किडनी) ही करते हैं। हेपेटाइटिस रोग में लीवर में सूजन और क्षति पहुंचने लगती है जिसका असर किडनी पर भी पड़ता है। हेपेटाइटिस के चलते किडनी को पहुंचने वाले नुकसान कई प्रकार के हो सकते हैं। आइए इस खास मौके पर फोर्टिस अस्‍पताल के डॉ. संजीव गुलाटी (प्रधान निदेशक, नेफ्रोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्‍लांट) से जानते हैं उनके बारे में।  

(1) एक्यूट किडनी इंजरी-
 यह आमतौर पर एक्‍यूट वायरल हेपेटाइटिस की वजह से हाता है जिसका कारण हेपेटाइटिस वायरस ए, बी, सी, डी और ई हो सकता है। इसके लिए हाइड्रेशन थेरेपी की मदद ली जाती है और किसी भी किस्‍म के लिवर रोग के उपचार तथा किडनी को पहुंची क्षति से पूरी तरह से उबरना मुमकिन होता है। जितना ज्‍यादा लिवर को नुकसान होता है उतना ही अधिक नुकसान किडनी को भी होता है। इसलिए इन मरी़जों का इलाज लिवर और किडनी स्‍पेश्‍यलिस्‍ट्स की एक्‍सपर्ट टीम द्वारा होना चाहिए।

(2) ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस-
 ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस किडनी फिल्‍टर्स या ग्‍लोमेरुली की सूजन को कहते हैं। ऐसा प्राय: हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी संक्रमणों के मामले में देखा जाता है। इसमें इम्‍यून के प्रभावित होने की वजह से किडनी फिल्‍टर्स को क्षति पहुंचती है और उनमें सूजन आती है। इसकी वजह से पेशाब में ब्‍लड और प्रोटीन जाने लगता है तथा यूरिया एवं क्रिटनाइन का स्‍तर बढ़ जाता है। यदि समय पर पकड़ में आ जाए तो क्रोनिक किडनी डैमेज से बचाव मुमकिन है। इसलिए इन मरीजों को तत्‍काल नेफ्रोलॉजिस्‍ट से सलाह करनी चाहिए और संभव हो तो किडनी बायप्‍सी भी करानी चाहिए। उपचार के लिए एंटीवायरल्‍स तथा इम्‍युनोसप्रेसिव एजेंट्स के इस्‍तेमाल की सलाह दी जाती है। 

(3) हिपैटोरीनल सिंड्रोम-
 यह आमतौर पर लिवर को गंभीर क्षति पहुंचने पर होता है जिससे किडनी को नुकसान होता है। शुरुआती चरण में इसका उपचार दवाओं से किया जा सकता है लेकिन अक्‍सर इसके लिए लिवर ट्रांसप्‍लांट की जरूरत होती है। एडवांस स्‍टेज में किडनी के भी गंभीर रूप से रोगग्रस्‍त होने पर कई बार लिवर और किडनी ट्रांसप्‍लांट दोनों जरूरी होते हैं। 

विभिन्‍न प्रकार के हेपेटाइटिस रोगों में, किडनी को नुकसान आमतौर पर हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी की वजह से पहुंचता है। ये दोनों संक्रमण शेयर्ड सुइयों (जो कि अब आमतौर पर नहीं इस्‍तेमाल होती हैं), संक्रमित शरीर द्रव्‍यों और रक्‍त चढ़ाने पर होते हैं। इसलिए हिमोडायलसिस वाले मरीज़ों को इन संक्रमणों का खतरा अधिक रहता है। इनसे उन मरीज़ों को काफी नुकसान पहुंच सकता है जिनके किडनी ट्रांसप्‍लांट की योजना होती है।

इन मरीज़ों में सेप्सिस होने का भी खतरा अधिक होता है। इसके अलावा, किडनी ट्रांसप्‍लांट के बाद इन्‍हें डायबिटीज़ होने का जोखिम बढ़ सकता है और ट्रांसप्‍लांटेड किडनी का जीवनकाल भी घट सकता है। इसलिए, सभी डायलसिस मरीज़ों की हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी संक्रमण के लिए नियमित रूप से जांच होनी चाहिए। हेपेटाइटिस बी तथा हेपेटाइटिस सी इंफेक्‍शन के लिए कई कारगर एंटीवायरल दवाएं उपलब्‍ध हैं और यदि ये संक्रमण जल्‍द पकड़ में आ जाएं तो लिवर को ज्‍यादा नुकसान पहुंचाने से बचा जा सकता है। 

उपचार से बेहतर है बचाव-
इसलिए हेपेटाइटिस बी तथा सी के मामले में, यह कहावत ही ज्‍यादा सार्थक है कि ‘उपचार से बेहतर है बचाव’। हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस बी वायरस से बचाव के लिए एक कारगर वैक्‍सीन भी उपलब्‍ध है। इस तरह के वायरस से बचाव के लिए बचपन में ही पूरा वैक्‍सीनेशन करवाना चाहिए और अन्‍य वैक्‍सीन भी समय-समय पर लेनी चाहिए। लेकिन अक्‍सर देखा जाता है कि किडनी रोगों से ग्रस्‍त मरीज़ों का या तो वैक्‍सीनेशन नहीं हुआ होता या उनके शरीर में एंटीबॉडीज़ काफी कम होती हैं। क्रोनिक किडनी रोग से ग्रस्‍त मरीज़ों को हेपेटाइटिस बी वैक्‍सीन की अधिक खुराक की आवश्‍यकता होती है। लेकिन हेपेटाइटिस सी से बचाव के लिए फिलहाल कोई वैक्‍सीन उपलब्‍ध नहीं है। डायलसिस मरीज़ों को हेपेटाइटिस के संक्रमण से बचाने का सबसे कारगर तरीका है।

ब्‍लड ट्रांसफ्यूज़न से बचना और कड़ाई से अन्‍य सावधानियों का पालन करना, जिसमें एक अच्‍छी डायलसिस यूनिट का चुनाव करना सबसे महत्‍वपूर्ण है, जहां इस प्रकार की सभी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। इसके लिए हो सकता है कि आपको सामान्‍य से कुछ अधिक खर्च करना पड़े लेकिन आगे चलकर ऐसा करना फायदेमंद साबित होता है क्‍योंकि इन संक्रमणों से बचाव के लिए दवाएं लेना और संक्रमण का जोखिम होने पर अस्‍पतालों में भर्ती होने के खर्चों की तुलना में यह सस्‍ता विकल्‍प है।

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