What is the difference between FIR and complaint? – FIR और शिकायत में क्या अंतर है?

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यदि किसी व्यक्ति के साथ कोई क्राइम होता है तो वह व्यक्ति स्वंय जाकर FIR दर्ज करा सकता है या घटना का चश्मदीद गवाह या आपका कोई रिश्तेदार भी FIR दर्ज करा सकता है क्योंकि Emergency की स्थिति में पुलिस फोन कॉल या ई-मेल के आधार पर भी FIR  दर्ज कर सकती है। इसके लिए एफ आई आर दर्ज कराने वाले व्यक्ति की यह जिम्मेदारी होती है कि वह पुलिस को घटना क्रम की सही जानकारी और तारीख बताए।

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FIR एक मजबूत दस्तावेज होता है किसी भी गंभीर मामलों (संज्ञेय क्राइम – तुंरत संज्ञान में लिए जाने योग्य) में कराई जा सकती है, जैसे गोली चलाना, मर्डर व रेप आदि होते हैं। ऐसे गंभीर मामलों में सीधे FIR दर्ज की जाती है। और पुलिस मात्र FIR के बलबूते पर अपराधी को अरेस्ट कर सकती है। CRPC की धारा – 154 के तहत पुलिस को संज्ञेय मामले में सीधे तौर पर FIR दर्ज करना जरूरी होता है।

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इसके अलावा FIR चोरी के मामले में भी लिखवाई जा सकती है। जैसे कोई भी सामान, मोबाईल, सिम तथा कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज आदि। अगर आप खोई हुई चीज़ों की प्राथमिकी दर्ज कराते हैं तो वह एक लिखित प्रमाण होता है कि आपका सामान इस तारीख, समय व स्थान से गुम हो गया है। क्योंकि अगर भविष्य में उसका कोई भी दुरुपयोग होता है तो उसमे शिकायत कर्ता का कोई दोष नही है। तथा इनकी बरामदी होने पर तुरंत सुचित किया जाए।

जो मामूली मारपीट आदी के क्राइम होते है। ऐसे मामले में सीधे तौर पर FIR नहीं दर्ज की जा सकती, बल्कि शिकायत को Magistrate को रेफर किया जाता है। फिर वह आरोपी को एक पत्र जारी करता है।

FIR और शिकायत में क्या अंतर है?

पहली सूचना रिपोर्ट और पुलिस शिकायत के बीच अंतर का मुख्य बिंदु यह है कि एक प्राथमिकी एक संज्ञेय अपराध से संबंधित है, जबकि संज्ञेय और गैर-संज्ञेय वर्ग अपराधों दोनों के लिए पुलिस शिकायत दर्ज की जा सकती है। … जबकि एफआईआर आमतौर पर पूर्व-परिभाषित प्रारूप में होती है।

क्या एफआईआर के बाद मुकदमा वापस लिया जा सकता है?

एक बार पंजीकृत होने के बाद, एक एफआईआर वापस नहीं ली जा सकती है। या तो मुकदमे के दौरान उसके पक्ष में आपके बयान रक्षा के मामले में आपके दोस्तों की मदद करेंगे और वह बरी हो जाएगा या वह हाई कोर्ट मे एफआईआर को रद्द करने के लिए जा सकता है। एफआईआर केवल उच्च न्यायालय द्वारा रद्द की जा सकती है।

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