आज इस विशेष योग में लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से मिलेगी मां लक्ष्मी की कृपा, सुख-सौभाग्य का होगा आगमन

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आज के दिन माता लक्ष्मी को कमल या फिर लाल गुलाब का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है. इसके साथ ही पूजा के समय देवी मां को सफेद मिठाई या फिर खीर का भोग लगाया जाता है. पूजा के समय में श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना भी उत्तम माना जाता है. 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रत्येक दिन अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है. इसी तरह से शुक्रवार का दिन धन और यश की देवी मां लक्ष्मी (Laxmi Pujan) को समर्पित है. इस देवी की उपासना की जाती है. मान्यता है कि इस दिन माता को प्रसन्न करने के लिए पूजा के समय खीर का भोग लगाया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सप्ताह में शुक्रवार का दिन लक्ष्मी पूजा (Laxmi Puja) के लिए विशेष शुभ माना जाता है. कहते हैं मां लक्ष्मी उसी घर में वास करती हैं, जहां साफ-सफाई का ध्यान रखा जाता है. मान्यता है कि इस दिन माता लक्ष्मी और मां संतोषी की पूजा-उपासना करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और वैभव का आगमन होता है. आज के दिन माता लक्ष्मी को कमल का फूल या फिर लाल गुलाब का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है. इसके साथ ही पूजा के समय देवी मां को सफेद मिठाई या फिर खीर का भोग लगाया जाता है. पूजा के समय में श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना भी उत्तम माना जाता है.

 

ज्योतिषियों के अनुसार आज शुक्रवार को अति विशिष्ट लक्ष्मी नारायण योगा (Laxmi Narayan Yog) का निर्माण हो रहा है. आज तुला राशि में बुध और शुक्र ग्रह एक साथ आ जाने के कारण इस योग का निर्माण होता है. इस योग को माता लक्ष्मी के पूजन और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे शुभ माना जाता है. धार्मिक दृष्टि से इस खास योग में माता लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने की सलाह दी जाती है. मां लक्ष्मी की मूर्ति या प्रतिमा के आगे घी का दीपक जला कर लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने से घर में धन-धान्य और सौभाग्य का आगमन होता है. 

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लक्ष्मी चालीसा (laxmi Chalisa)

दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।

मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥

सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।

ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

सोरठा

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।

सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥

जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥

तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥

जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥

ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥

ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।

करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥

भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥

बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥

रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥

रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

दोहा

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।

जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥

रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।

मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥

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