अब पोस्ट ऑफिस स्कीमों और म्युचुअल फंडों की तरफ भाग रहे हैं. ऐसे में बैंकों की टेंशन बढ़ गई है क्या होगा अब ?

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अनोखी आवाज़ बैंकों में वैसे भी 5 साल के मुकाबले कम अवधि यानी एक दो साल के डिपॉजिट पर ज्यादा ब्याज मिलता है. पिछले तीन-चार सालों में ब्याज दरें घटने से फिलहाल एफडी निवेश के लिए आकर्षक नहीं रह गया है. देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में 5 साल की एफडी पर ब्याज दर 5.30 फीसदी है. सीनियर सिटिजन के लिए यह 5.8 फीसदी है. एचडीएफसी बैंक में भी दरें इतनी ही हैं. इंडसइंड बैंक में 6.5 फीसदी और यस बैंक में 6.7 फीसदी हैं. चूंकि महंगाई दर भी इस दौरान 5 फीसदी के आसपास ही रही है. ऐसे में जमा पर मिलने वाला ब्याज एक तरह से निल या नाम मात्र ही रह जाता है. ऐसे में रिटर्न के मामले में यह निवेशकों के लिए आकर्षण नहीं रह गया है।

सेक्शन-80C नौकरीपेशा या आम आदमी के लिए इनकम टैक्स में छूट का सबसे बड़ा जरिया माना जाता है. इसके तहत ढाई लाख रुपये तक की बेसिक एग्जेम्शन लिमिट के बाद भी कर योग्य आय (Taxable income) में 1.5 लाख तक कटौती पाई जा सकती है. इसके लिए जरूरी है कि कुछ खास स्कीमों में डेढ़ लाख रुपये तक निवेश किया गया हो या कुछ तय खर्चों में शामिल हो. मसलन, पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF), एम्प्लॉयी प्रोविडेंट फंड (EPF), नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (NSC), इंश्योरेंस प्रीमियम, म्युचुअल फंडों के यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIP ) या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीमें (ELSS) इसके दायरे में आती हैं.

कभी आम आदमी का पसंदीदा निवेश जरिया रहे बैंक एफडी यानी फिक्स्ड डिपॉजिट के दिन अच्छे नहीं चल रहे. एक तो बीते कुछ वर्षों से लगातार एफडी पर ब्याज दरें गिरती आई हैं. उस पर से जो लोग टैक्स बचाने के मकसद से लंबी अवधि की एफडी किया करते थे, वे अब पोस्ट ऑफिस स्कीमों और म्युचुअल फंडों की तरफ भाग रहे हैं. ऐसे में बैंकों की टेंशन बढ़ गई है. उन्हें फंड की किल्लत का खतरा सता रहा है. ऐसे में बैंकों ने सरकार से एफडी को इन्वेस्टर फ्रेंडली बनाने की गुहार लगाई है।

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